歌词
मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
उसे समझने का कोई तो...
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले
मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
♪
किताब-ए-माज़ी के पन्ने उलट के देख ज़रा
किताब-ए-माज़ी के पन्ने उलट के देख ज़रा
ना जाने कौन सा पन्ना मुड़ा हुआ निकले
ना जाने कौन सा पन्ना मुड़ा हुआ निकले
ये ग़ज़ल जनाब वसीम बरेलवी साहब की है
और अभी जो मैंने शेर पढ़ा वो असल में थोड़ा सा अलग है
लेकिन मैंने अपनी सहूलियत के लिए थोड़ी सी गुस्ताख़ी की है
इसकी मैं माफ़ी चाहूँगा आप से भी
और जनाब वसीम बरेलवी साहब से भी
वो शेर असल में कुछ ऐसे है
किताब-ए-माज़ी के औराक़ उलट के देख ज़रा
किताब-ए-माज़ी के औराक़ उलट के देख ज़रा
ना जाने कौन सा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले
लीजिए अगला शेर पेश कर रहा हूँ
♪
जो देखने में बहुत ही क़रीब लगता है
जो देखने में बहुत ही क़रीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासला निकले
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासला निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले
मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले