歌词
माना कि मुश्ते-ए-खाक़ से बढ़कर नहीं हूँ मैं
... लेकिन हवा के रहम-ओ-करम पर नहीं हूँ मैं
इंसान हूँ धडकते हुए दिल पे हाथ रख
यूँ डूब कर ना देख समंदर नहीं हूँ मैं
चेहरे पे मल रहा हूँ सियाही नसीब की
आइना हाथ में है सिकंदर नहीं हूँ मैं
ग़ालिब तेरी ज़मीं पे लिखी तो है ग़ज़ल
तेरे क़द-ए-सुखन के बराबर नहीं हूँ मैं