歌词
तारों के आंगन में
चाँद यूँ है ग़ुम
आँखें हैं बतला रही
खामोश हैं हम-तुम
इन आँखों की गहराई में
जो खो भी जाऊं मैं तो
क्या कसूर?
क्या कसूर?
क्या कसूर?
क्या कसूर?
रंगों सी ये शामें
हैं हवांए गुमसुम
राहें हैं चल रही
थम गए हम-तुम
इन लफ़्ज़ों को कह जाने में
बेपरवाह हो जाऊं मैं तो
क्या कसूर?
क्या कसूर?
क्या कसूर?
क्या कसूर?
♪
हसीं है ये रातें
अधूरी हैं कुछ बातें
क्या कसूर?
क्या कसूर?
क्या कसूर?
क्या कसूर?